Prmod shah
भारत में पत्रकारिता का विकास एक लंबी संघर्षपूर्ण यात्रा है। यह न केवल सूचना का माध्यम रहा, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का उत्प्रेरक भी। आजादी से पहले यह स्वाधीनता संग्राम का हथियार था, आजादी के बाद लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बना और आज डिजिटल युग में यह व्यावसायिकता, चुनौतियों और नई संभावनाओं का मिश्रण है।
आजादी से पहले: राष्ट्रवादी जागरण का युग (1780-1947)
भारत में आधुनिक पत्रकारिता की शुरुआत 29 जनवरी 1780 को कोलकाता से जेम्स ऑगस्टस हिक्की द्वारा प्रकाशित हिक्की का बंगाल गजेट (Bengal Gazette) से हुई। यह एशिया का पहला अखबार था, जो ब्रिटिश अधिकारियों की आलोचना के लिए जाना जाता था। हिक्की को अपनी जनपक्षी स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जेल और जुर्माना झेलना पड़ा, लेकिन तमाम जुर्म को सहन करने के बाद भी भारत की पत्रकारिता की बुनियाद हिक्की ने ही रखी ।
हिक्की तत्कालीन गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स पर भ्रष्टाचारअवैध युद्ध छोड़ने,लोगों की अभिव्यक्ति को दबाने के साथ ही एक गुलाम देश में न्यायपालिका और कार्यपालिका की अलग पहचान के आधार पर पत्रकारिता शुरू की, चीफ जस्टिस एलिजा इम्पे के साथ मिलीभगत — न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच भ्रष्ट गठजोड़ का आरोप।
हिक्की की यह आलोचना इतनी कठोर थी कि हेस्टिंग्स ने उन्हें मानहानि के मुकदमे में जेल भेज दिया। जेल से भी हिक्की ने अखबार जारी रखा और आलोचना जारी रखी। अंततः 1782 में सरकार ने उनका प्रेस छीन लिया
इसके बाद 19वीं सदी में भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता उभरी। राजा राममोहन राय ने 1821 में बांग्ला संवाद कौमुदी और 1822 में फारसी मिरात-उल-अखबार शुरू किया। 1826 में पंडित #जुगल किशोर शुक्ला ने हिंदी का पहला अखबार उदंत मार्तंड निकाला। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी कानून लागू किए: प्रेस सेंसरशिप एक्ट 1799, लाइसेंसिंग एक्ट 1857, वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 1878 (लॉर्ड लिटन द्वारा) और गैगिंग एक्ट।
फिर भी पत्रकारिता फली-फूली। बाल गंगाधर तिलक ने केसरी (मराठी) और मराठा (अंग्रेजी) से स्वराज की मांग की। महात्मा गांधी ने यंग इंडिया, नवजीवन और हरिजन के माध्यम से अहिंसा और सत्याग्रह का प्रचार किया। #गणेशशंकर विद्यार्थी का प्रताप (कानपुर, 1913) किसानों-मजदूरों की आवाज बना। अन्य प्रमुख: अमृत बाजार पत्रिका, बंदे मातरम (अरविंद घोष), हिंदुस्तान टाइम्स (मदन मोहन मालवीय)। यह पत्रकार और अखबार ही थे जिन्होंने हर दौर में भारत की आजादीके आंदोलन को लगातार ऑक्सीजन दी उसे काम नहीं होने दिया,तमाम प्रतिबंधों के बाद भी भारत मेंस्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता की परंपरा नहीं होतीतो संभव था कि यह देश आजाद भी ना होता
इस युग में पत्रकारिता मिशन-आधारित थी। यह राष्ट्रवाद, सामाजिक सुधार (सती प्रथा, विधवा विवाह) और ब्रिटिश शोषण के खिलाफ हथियार थी। साक्षरता कम होने के बावजूद यह जन-जागरण का माध्यम बनी। 1947 तक हजारों अखबार निकल रहे थे।
आजादी के बाद: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ (1947-1975)
स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता का उद्देश्य बदल गया — आंदोलन से राष्ट्र-निर्माण की ओर। संविधान में अनुच्छेद 19(1)(a) ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी, लेकिन 1951 में पहला संशोधन और प्रेस (अब्जेक्शनेबल मैटर्स) एक्ट ने “उचित प्रतिबंध” लगाए।
1954 में प्रेस कमीशन (राजाध्यक्ष) गठित हुआ, जिसकी सिफारिश पर 1966 में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) बनी। 1950-60 के दशक में अंग्रेजी अखबार जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस मजबूत हुए। क्षेत्रीय भाषाओं में भी विस्तार हुआ।
#कालेसाल1975-77 की आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने सेंसरशिप थोपी। कई संपादक जेल गए, कुलदीप नैयर ,के ,आर मलकानी, निखिल चक्रवर्ती,सी राघवन जैसे लगभग 258पत्रकार जेल भेज दिए गए लेकिन कुछ अखबारों ने विरोध किया ,
#आपातकाल के बाद पत्रकारिता अधिक सतर्क हुई। 1980 के दशक में टीवी (दूरदर्शन) का उदय हुआ। 1982 में एशियाड के दौरान राष्ट्रीय प्रसारण शुरू हुआ।
इस काल में पत्रकारिता व्यावसायिक और पेशेवर बनी। यह सरकार की नीतियों (पंचवर्षीय योजनाएं, हरित क्रांति) की आलोचना और समर्थन दोनों करती थी। अखबारों का सर्कुलेशन बढ़ा — 1990 तक रिकार्ड लाखों प्रतियां बिकती थीं।
वर्तमान हालत: डिजिटल युग की चुनौतियां और परिवर्तन (1991 से अब तक)
1991 की आर्थिक उदारीकरण ने मीडिया को भी पूरी तरह बदल दिया। केबल टीवी, सैटेलाइट चैनल्स (स्टार टीवी 1991) और इंटरनेट का आगमन हुआ। आज भारत में:
लगभग 1,40,000 प्रकाशन (20,000 दैनिक अखबार)।
900+ निजी टीवी चैनल (आधे न्यूज)।
डिजिटल मीडिया का प्रभुत्व — Reuters Institute Digital News Report 2025 के अनुसार, भारत में YouTube पर न्यूज खपत सबसे ज्यादा (55%) है।
डिजिटल क्रांति ने पहुंच बढ़ाई। स्मार्टफोन और सस्ता डेटा (Jio 2016) से ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच गई। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (Netflix, JioCinema) और सोशल मीडिया (WhatsApp, X, Instagram) ने समाचार वितरण बदला। क्षेत्रीय भाषाओं का डिजिटल कंटेंट 50% से ज्यादा है।
यद्यपि आज भारत में पत्रकारिता के ऊपरविभिन्न आरोप और दबाव हैं।उन्हेंजनता के पक्ष से विमुख होकर सत्ता के लिए नरेटिव सैटर के रूप में देखा जा रहा है..लेकिन फिर भी जो भी जहां भी सत्ता के गलियारों के बाहर आम आदमी कीआवाज मुखर है।उसका श्रेय भीपत्रकारिता को ही जाता है.हमने देखा भारत की आजादी में अखबार और पत्रकारों की मुख्य भूमिका रहीऔर आज भी हम कह सकते हैं
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पत्रकारिता में ही है,यदि यह स्वस्थ होगी उन्नत होगी तो राष्ट्र निश्चित रूप से उन्नति करेगा यदि पत्रकारिता बीमार होगी तो राष्ट्र निरंतर तंगहाली और बदहाली की तरफ बढ़ता जाएगा..
सभी पत्रकारों को पत्रकारिता दिवस की बहुत बधाई और निवेदन की राष्ट्र की न केवल उन्नति बल्कि उसके भीतर प्राण बचे रहें इसके लिए पत्रकार और पत्रकारिता कितनी जरूरी है यह विचार बना रहे !
#पत्रकारितादिवस
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