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इस तरह बना चिपको आंदोलन चिपको

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चिपको आंदोलन के प्रेरणा चंडी प्रसाद भट्ट ने बताया कि 27मार्च 1973 को सर्वोदय केंद्र गोपेश्वर में पेड़ों को बचाने के लिए चिपको का विचार रखा गया।
01 अप्रैल 1973 को मंडघाटी के जंगलो को बचाने के लिए चंडी प्रसाद भट्ट द्वारा पहली रणनीतिक बैठक का आयोजन। पेड़ों को बचाने के लिए उन पर अंग्वाल्ठा मारने ( चिपकने)का निर्णय।
24 अप्रैल 1973 को पेड़ों को कटने से बचाने के लिए मंडल घाटी के गोंडी चिपको आंदोलन भारी जन आक्रोश को देखकर कंपनी के मजदूर जंगल से वापस लौटे।
20जून 1973 को फाटा में मैखंडा के जंगलो को बचाने के लिए चंडी प्रसाद भट्ट तथा आनंद सिंह बिष्ट द्वारा केदार सिंह रावत के सहयोग से स्थानीय ग्रामीणों के साथ चिपको की बैठक। 26 जून की बैठक में शंखध्वनि से वन की चौकीदारी का निर्णय।
25 दिसंबर 1973को फाटा में चिपको आंदोलन।
रेणी के जंगल को बचाने के लिए चिपको आंदोलन की ब्यापक तैयारी हेतु जनवरी 1974 में चंडी प्रसाद भट्ट , गोविंद सिंह रावत,वासवानंद नौटियाल,तथा हयाद सिंह का रैणी भ्रमण एवं गाँवों में चिपको गोष्ठियाँ।
15मार्च 1973 को जोशीमठ में रेणी के जंगल की नीलामी के खिलाफ विशाल जन आक्रोश रैली।
26 मार्च 1974 को रैनी के जंगल में कंपनी के मजदूरों से प्रत्यक्ष टकराव। गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेडों से चिपक कर उन्हें कटने से बचाया।
09 मई 1974 को डॉ वीरेंद्र कुमार की अध्यक्षता में सरकार द्वारा वनों के अध्यन के लिए एक कमेटी का गठन।