Home उत्तराखंड गढवाल और कुमायूं की सांझी सांस्कृतिक विरासत “वांण का लाटू”

गढवाल और कुमायूं की सांझी सांस्कृतिक विरासत “वांण का लाटू”

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चमोली जनपद के देवाल विकासखंड के वांण गांव में स्थित लाटू देवता की सम्पूर्ण जगत में पहाड़ की आराध्य देवी मां नंदा राज राजेश्वरी के धर्म भाई के रूप में स्थापित मान्यता है।वांण का लाटू ही वांण से आगे चौसिंग्या मेढे के साथ ऐतिहासिक राजजात की अगुवाई करता है।
वांण के लाटू के संदर्भ में वर्षों पूर्व दादा जी ने एक कथा सुनाई थी जो इस प्रकार है।
पाली पछाऊं द्वाराहाट के शासक जो कि द्वर्याण कहलाते थे किसी समय में विहार हेतु इस रमणीक क्षेत्र में आये। लाव लश्कर के साथ यहां आने से पूर्व उन्होंने राजकाज की जिम्मेदारी अपने कान्यकुब्ज गौड़ ब्राह्मण वजीर को सौंप दी। काफी समय तक द्वर्याण जब यहां से वापस नहीं लौटे तो उनका वजीर लाल घोड़े पर साफा पहने उनको ढूंढते हुए इस क्षेत्र में आया । आमोद प्रमोद में मग्न द्वर्याणों ने जब किसी घुड़सवार को दूर से इस ओर आते देखा तो पहचान न पाने कारण उस पर तत्काल हमला कर उसे घायल कर दिया। किन्तु जब तक द्वर्याणों को समझ में आया कि उन्होंने अपने ही वजीर पर हमला किया है तब तक देर हो चुकी थी। ब्रह्म हत्या के भय से विचलित द्वर्याणों ने वजीर को बचाने की काफी कोशिशें की किन्तु वे उसे बचा न सके।वांण में “लाटू तीथांण” और च्यौत जैसे स्थान आज भी मौजूद हैं ,और लाटू के गीतों में उल्लिखित हैं।
ब्रह्महत्या के पाप के भाजक बन द्वर्याण निर्वंशी हुए और राज्य छिन्न भिन्न हो गया। द्वर्याणों के अल्मोड़ा वासी बहन के बेटे मादोसिंह ने ब्रह्म हत्या के दोष निवारण हेतु वांण गांव में (खैर का खम्भा और तांबा का पातर सहित )अपनी मां के मायके के उस वजीर का मंदिर स्थापित किया । वांण गांव में जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है वह आज भी द्वादा (द्वाद) कहलाता है। यही वजीर कालांतर में लाटू नाम से प्रसिद्ध हुआ।
निश्चित ही यह एक जनश्रुति आधारित समानान्तर कथा है किन्तु यह कथा कुमायूं गढ़वाल को शिद्दत से जोड़ती है । आज भी अल्मोड़ा से आने वाली जात (यात्रा) राजजात में शामिल होकर वांण से ही लौट जाती है।
दादाजी से सुनी इस कथा पर आधारित मेरे लेख को लगभग 15-20 बरस पहले सुप्रसिद्ध हुक्का क्लब अल्मोड़ा से प्रकाशित सांस्कृतिक पत्रिका “पुरवासी” के रजत जयंती विशेषांक में स्थान देने के लिए इस संस्था का आभार अन्य साथियों ने भी उस लेख के आधार पर राजजात सम्बन्धी पुस्तकों में इसे स्थान दिया।आस्था, विश्वास और परंपरा की यह त्रिवेणी हमारी समृद्ध विरासत के अनोखे पहलू को दर्शाती है।
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