परियोजना से मिले सहयोग से हस्तशिल्पी बन रहे आत्मनिर्भर
ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना चमोली के हस्तशिल्पियों के लिए वरदान साबित हो रही है। परियोजना से प्राप्त प्रशिक्षण, मार्गदर्शन एवं वित्तीय सहयोग के माध्यम से स्थानीय हस्तशिल्पियों को अपने पारंपरिक कौशल को विकसित करने का अवसर मिल रहा है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन रहे हैं।
इस पहल के अंतर्गत हस्तशिल्पियों को न केवल उद्यम स्थापित करने में सहायता दी जा रही है, बल्कि उन्हें बाजार से जोड़ने, उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और आय बढ़ाने के लिए भी निरंतर सहयोग प्रदान किया जा रहा है। जिससे हस्तशिल्प आधारित आजीविक उद्यमों को बढ़ावा मिलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त हो रही है।
चमोली जनपद के ग्राम छिनका की निवासी श्रीमती सुशीला देवी इसका एक सशक्त उदाहरण हैं। सुशीला ने अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) सहायतित ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम बढ़ाया है।
सुशीला देवी, जो पहले केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, आज “जय माँ भगवती” स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपने हैंडलूम (हस्तकरघा) उद्यम के माध्यम से अपनी अलग पहचान बना रही हैं। वे “भोटिया जनजाति” ग्राम संगठन एवं “बिरही गंगा” क्लस्टर के अंतर्गत सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं।
उन्होंने 15 फरवरी 2026 से अपने हैंडलूम उद्यम की शुरुआत की। इस उद्यम की स्थापना में उन्हें ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना के तहत ₹75,000 की परियोजना सहायता प्राप्त हुई, साथ ही उन्होंने ₹1.5 लाख का CCL (कैश क्रेडिट लिमिट) ऋण लेकर अपने कार्य को विस्तार दिया।
वर्तमान में वे कोट, शॉल, मफलर और पंखी जैसे पारंपरिक उत्पाद तैयार कर रही हैं, जिन्हें स्थानीय बाजार में अच्छी मांग मिल रही है। इस उद्यम से उन्हें प्रतिमाह लगभग ₹9,000 की आय प्राप्त हो रही है, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है।
ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना के तहत मिले मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग से सुशीला देवी न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनी हैं, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन रही हैं। उनका यह प्रयास ग्रामीण महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
सुशीला देवी, कहती हैं—
“पहले मैं केवल घर के काम तक ही सीमित थी, लेकिन ग्रामोत्थान परियोजना से जुड़ने के बाद मुझे अपने हुनर को पहचानने और आगे बढ़ाने का अवसर मिला। आज मैं अपने हाथों से बनाए उत्पादों को बाजार में बेचकर न केवल आय अर्जित कर रही हूं, बल्कि अपने परिवार को आर्थिक रूप से सहयोग भी दे पा रही हूं। यह परियोजना हम जैसी महिलाओं के लिए सच में एक नया रास्ता खोल रही है।”








