दीपक फर्सवाण
देहरादून : 17 साल। 15 हेलीकॉप्टर हादसे। 46 मौत। ये आंकड़े व्यक्तिगत तौर पर मुझे विचलित कर रहे हैं। सोच रहा हूं चारधाम यात्रा हवाई में श्रद्धालुओं की जान की कीमत क्या इतनी सस्ती है कि एक के बाद एक हेलीकॉप्टर हादसों के बावजूद जिम्मेदार तंत्र पर कोई आंच नहीं आती ? इन हादसों में खराब मौसम, अचानक घने बादल छाना, कम दृश्यता और तकनीकी खामियां प्रमुख कारणों के रूप में सामने आते रहे हैं। इसके बावजूद हेलीकॉप्टर संचालन की निगरानी और मौसम के मद्देनजर उड़ानों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी निभाने वाले उत्तराखण्ड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (यूकाडा) की जवाबदेही तय नहीं की जा रही।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब खराब मौसम में उड़ान संचालित करने या रोकने का निर्णय यूकाडा अथवा जिला प्रशासन के स्तर पर लिया जाता है तो फिर मौसम की अनिश्चितता के बीच उड़ानों की अनुमति देने की जिम्मेदारी किसकी है ? क्या यूकाडा के पास मौसम का सटीक आकलन करने और उड़ान की सुरक्षित परिस्थितियों का निर्णय लेने के लिए पर्याप्त तकनीकी विशेषज्ञता है ? यदि नहीं, तो इतने संवेदनशील हवाई मार्ग पर उड़ानों का संचालन किस आधार पर नियंत्रित किया जा रहा है ? हाल ही में बदरीनाथ में हुई हेलीकॉप्टर दुर्घटना ने यूकाडा की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे वाले दिन सुबह यूकाडा की अनुमति से हेलीकॉप्टर उड़ानों को रोक दिया गया था। लेकिन कुछ ही देर बाद अचानक उड़ान संचालन फिर शुरू कर दिया गया। जब सुबह मौसम को उड़ान के अनुकूल नहीं माना गया था तो फिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां बदलीं कि कुछ समय बाद ही उड़ान की अनुमति दे दी गई ? वह भी ऑरेंज अलर्ट जारी होने के बावजूद। क्या मौसम का दोबारा तकनीकी परीक्षण किया गया था ? क्या किसी विशेषज्ञ ने उड़ान के लिए सुरक्षित परिस्थितियों की पुष्टि की थी ? और यदि ऐसा हुआ था तो उसका आधार क्या था ?
इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए। आखिर जब उड़ान रोकने और दोबारा शुरू करने का निर्णय लेने का अधिकार संबंधित प्राधिकरण के पास है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। महज अनुमति जारी कर देना और हादसे के बाद जिम्मेदारी से बच निकलना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। याद रहे, चारधाम का हवाई मार्ग सामान्य हवाई मार्गों की तरह नहीं है। यहां पहाड़ी भूगोल, अचानक बदलता मौसम, घाटियों में बादलों का जमाव और कम दृश्यता उड़ानों को बेहद जोखिमपूर्ण बना देते हैं। ऐसे में उड़ान संचालन की अनुमति देने के लिए मौसम संबंधी सटीक जानकारी और तकनीकी विशेषज्ञता बेहद जरूरी है। मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ji ने दुर्घटना की जांच के आदेश दिए हैं। यह जरूरी है कि तफ्तीश तह तक हो। जांच में कुछ अहम बिन्दु शामिल किए जाने चाहिए। क्या यूकाडा के पास मौसम की ऐसी परिस्थितियों का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए पर्याप्त तकनीकी विशेषज्ञ उपलब्ध हैं ? क्या उड़ान रोकने और शुरू करने के लिए कोई स्पष्ट, पारदर्शी और विशेषज्ञ आधारित मानक व्यवस्था है ? यदि मौसम की स्थिति का सटीक आकलन करने वाला सक्षम तकनीकी तंत्र ही नहीं है तो फिर उड़ानों को हरी झंडी देने का आधार क्या है ? पिछले 17 वर्षों में 15 हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं होना अपने आप में बेहद गंभीर स्थिति है। हर हादसे के बाद जांच, कारणों की पड़ताल और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के दावे किए जाते हैं, लेकिन सबसे अहम सवाल अब भी कायम है कि उड़ान संचालन की अनुमति देने वाले संस्थागत तंत्र की जवाबदेही कब तय होगी ?
मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि अब तक हुए इन हादसों में किसी भी मामले में यूकाडा के स्तर पर जवाबदेही तय करने और कार्रवाई किए जाने का सवाल प्रभावी रूप से सामने नहीं आया है। यदि किसी हादसे में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां कारण बनीं और उड़ान संचालन की अनुमति संबंधित प्राधिकरण ने दी थी तो उस निर्णय की भी जांच होनी चाहिए। यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि उड़ान शुरू करने का फैसला किसने लिया, किस तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर लिया और क्या निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था। अब सुधार ही नहीं बल्कि जवाबदेही तय करने का वक्त आ चुका है। मुझे भरोसा है कि सरकार इस संवेदनशील मसले पर पूरा ध्यान देगी।
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