उत्तराखंड की हसीन वादियों में जब भी कोई धार्मिक यात्रा निकलती है, तो वह केवल आस्था का सफर नहीं होती, बल्कि आत्मीयता, सहयोग और समाज के एकसूत्र में बंधने का जीवंत उदाहरण बन जाती है। हाल ही में संपन्न हुई बगडवाल देवता की तीर्थ यात्रा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि जब देवकार्य में जनसहयोग और निष्काम सेवा मिलती है, तो वह यात्रा इतिहास बन जाती है।
इस पूरी यात्रा के दौरान जिन चेहरों, संस्थाओं और ग्रामवासियों ने कदम-कदम पर सहयोग दिया, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों का हिस्सा है।
2 सितंबर 2026 को जब यात्रा माणा गांव और बद्रीनाथ क्षेत्र में पहुँची, तो हर एक व्यक्ति ने अपनी पलकें बिछाकर स्वागत किया।
माणा गांव के सम्मानित माताओं, बहनों, बुजुर्गों, युवा साथियों, ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत (लपसा टीम) और समस्त ग्रामवासियों का जितना भी धन्यवाद किया जाए, वह कम है। आप सभी के आशीर्वाद और सक्रिय सहयोग से ही बगडवाल देवता के रात्रि विश्राम और भव्य भोज की व्यवस्था सुचारू रूप से संभव हो पाई। आपके इस स्नेह को माणा गांव की धरती और यात्रा से जुड़े हर एक सदस्य के हृदय में हमेशा के लिए अमर कर दिया है।
इस देवकार्य को और अधिक सुगम बनाने में श्री गुरुद्वारा प्रबंधक श्री सेवा सिंह जी का विशेष योगदान रहा, जिनके सानिध्य में सेवा का एक अनूठा उदाहरण देखने को मिला। इसके साथ ही,
3 सितंबर 2026 को बद्रीनाथ धाम में श्रीमान सुनील पुरोहित जी एवं सतगुरु आश्रम का सहयोग अतुलनीय रहा। भारी भीड़ और प्रबंधन की चुनौतियों के बीच जिस प्रकार उन्होंने विश्राम और भोजन की सुव्यवस्थित व्यवस्था संभाली, उसके लिए ग्राम पंचायत और समस्त समिति उनका हृदय से आभार व्यक्त करती है।
इस यात्रा की सफलता के पीछे कुछ ऐसे समर्पित मार्गदर्शक भी रहे जिन्होंने हर कदम पर संबल दिया। श्री कांति थपलियाल जी, श्री ओम प्रकाश डोबाल जी और श्री हरिकृष्ण भट्ट जी का आभार सत्कार शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। आप जैसे कर्मठ जनों की उपस्थिति से ही यह देवयात्रा अपनी पूर्णता को प्राप्त हुई।
शब्दों का जादू और आत्मीयता का भाव:
जब हम इन आयोजनों को देखते हैं, तो यह समझ आता है कि किसी भी आयोजन की सफलता सिर्फ पैसों या संसाधनों से नहीं, बल्कि दिल छू देने वाली भाषा, सम्मान और प्रेम से तय होती है। जब आभार व्यक्त करते समय ‘कोटि-कोटि प्रणाम’, ‘हृदय की गहराइयों से धन्यवाद’ और ‘अपनों सा अपनापन’ झलकता है, तो वह समाज को हमेशा के लिए जोड़ देता है। यह भाषा दिखावे की नहीं, बल्कि पहाड़ की उस निर्मल संस्कृति की है जो आतिथ्य को धर्म मानती है।
बगडवाल देवता की यह तीर्थ यात्रा हम सबको यह सिखा गई कि जब सबका साथ और देव-शक्ति का आशीर्वाद मिलता है, तो हर कठिन रास्ता आसान हो जाता है। इस पवित्र यात्रा से जुड़े हर एक सहयोगी, सेवक और ग्रामवासी को कोटि-कोटि नमन और अनंत आभार!
Sign in
Welcome! Log into your account
Forgot your password? Get help
Password recovery
Recover your password
A password will be e-mailed to you.








