चमोली। मां नंदा की बड़ी जात यात्रा अब धीरे-धीरे आबादी वाले क्षेत्रों को पीछे छोड़कर उच्च हिमालय के निर्जन और दुर्गम पड़ावों की ओर बढ़ने वाली है। 16 सितंबर के बाद यात्रा वाण से आगे गैरोलीपातल, बेदनी बुग्याल, पातरनचैणियां, रूपकुंड, ज्यूंरागली और शिलासमुद्र होते हुए होमकुंड पहुंचेगी। उच्च हिमालयी क्षेत्र में कई स्थानों पर पैदल मार्ग व्यवस्थित नहीं होने और ग्लेशियर खिसकने के कारण कुछ हिस्सों में यात्रियों को पहले की अपेक्षा अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। ऐसे में प्रशासन ने श्रद्धालुओं से सीमित संख्या में और पूरी सावधानी के साथ यात्रा करने की अपील की है।
मां नंदा की बड़ी जात यात्रा में दशोली और बंड की नंदा की उत्सव डोलियों के साथ विभिन्न गांवों की देव छंतोलियां और पश्वाओं के दल भी शामिल हैं। 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर से शुरू हुई यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है। गांव-गांव में मां नंदा की डोली का भव्य स्वागत किया जा रहा है और यात्रा मार्ग नंदा के जयकारों से गूंज रहा है।
वाण से गैरोलीपातल करीब 10 किलोमीटर, गैरोलीपातल से बेदनी बुग्याल तीन किलोमीटर, बेदनी से पातरनचैणियां छह किलोमीटर, पातरनचैणियां से रूपकुंड सात किलोमीटर, रूपकुंड से शिलासमुद्र 15 किलोमीटर और शिलासमुद्र से होमकुंड करीब 16 किलोमीटर दूर है। प्रशासन ने यात्रा मार्ग की सुरक्षा को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं। अलग-अलग पड़ावों पर पुलिस, आईटीबीपी और अन्य सुरक्षा बलों की तैनाती की जा रही है। एसडीआरएफ की टीमें भी अलर्ट मोड पर रहेंगी।
प्रशासन की एडवांस टीम होमकुंड तक के मार्ग का जायजा लेकर लौट चुकी है। टीम ने कई स्थानों पर रास्तों को असुरक्षित और अव्यवस्थित पाया है। विशेषकर शिलासमुद्र से होमकुंड तक का मार्ग चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
1987 और 2000 की नंदा राजजात यात्रा में शामिल रहे कुल पुरोहित सुरेंद्र प्रसाद मैठाणी के अनुसार, मां नंदा की यात्रा से जुड़ी आस्था सदियों पुरानी है। गांव-गांव से देव छंतोलियों का इसमें शामिल होना यात्रा को और भव्य बनाता है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद मां नंदा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था उन्हें कठिन रास्तों पर आगे बढ़ने का हौसला देती है।
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