चमोली। भगवान बदरी विशाल की शीतकालीन पूजा परंपराओं से जुड़ी सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा का एकादशी के शुभ पर्व पर निर्वहन किया गया। सीमांत गांव माणा के मोल्फा परिवार ने भगवान बदरी विशाल को पवित्र घृत कंबल (ऊन का लबादा) और पहाड़ी गाय का शुद्ध देसी घी भेंट किया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माणा गांव की सुहागिन महिलाओं और कन्याओं द्वारा उपवास रखकर एक ही दिन में तैयार किया जाने वाला यह घृत कंबल मातृवात्सल्य, श्रद्धा और भगवान के प्रति असीम स्नेह का प्रतीक है। शीतकाल में बदरीनाथ धाम में कड़ाके की ठंड के दौरान भगवान के विग्रह को सुरक्षित रखने के लिए इस विशेष कंबल का उपयोग किया जाता है।
बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने के समय मंदिर के मुख्य पुजारी (रावल) भगवान के विग्रह पर घी और केसर का लेप लगाकर घृत कंबल ओढ़ाते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार, शीतकाल के अगले छह महीनों तक भगवान इसी अवस्था में विराजमान रहते हैं।
गर्मियों में धाम के कपाट दोबारा खुलने पर घृत कंबल पर लगे घी की स्थिति को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष आस्था रहती है। मान्यता है कि कंबल पर घी का ताजा बने रहना देश की सुख-समृद्धि का शुभ संकेत है। इसके बाद घृत कंबल के टुकड़ों को श्रद्धालुओं में महाप्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
बदरीनाथ धाम की यह परंपरा उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक विरासत, लोक आस्था और माणा गांव की सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाती है।
Sign in
Welcome! Log into your account
Forgot your password? Get help
Password recovery
Recover your password
A password will be e-mailed to you.








