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नंदन- कानन!– 1 जून से सैलानियों के खुलेगी रंग बदलने वाली फूलों की घाटी,

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नंदन- कानन!– 1 जून से सैलानियों के खुलेगी रंग बदलने वाली फूलों की घाटी, फूलों के साथ ग्लेशियरों का भी कर सकेंगे दीदार..
ग्राउंड जीरो से संजय चौहान!
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सभी मित्रो को हिंदी पत्रकारिता दिवस की बहुत बहुत बधाई। विगत 20 सालों मैं मैंने अपनी लेखनी के जरिए उत्तराखंड की संस्कृति, प्रकृति, तीज त्यौहार, जनसरोकरो व सामाजिक सरोकारो से जुडे हर विषय पर लिखा है। आप लोगो को कितना पसंद आया हो ये आप ही बता सकते हैं। इन दो दशको में आप सभी लोगों नें बहुत सारा प्यार और स्नेह दिया है, जिसके आगे भी आकांक्षी रहेंगे। हिंदी पत्रकारिता दिवस पर रंग बदलने वाली एक खूबसूरत संसार पर आलेख..

आखिरकार 6 माह के इंतजार के बाद आगामी 1 जून से सैलानी विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी के दीदार कर सकेंगे। पर्यटकों और प्रकृति प्रेमी के चेहरे खिल उठे हैं जो फूलों की घाटी के खुलने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। इस साल चारधाम में जिस तरह से तीर्थयात्रियों का हुजूम उमड रहा है उसको देखते हुए प्रकृति प्रेमियों को यह उम्मीद है की इस बार फूलों की घाटी में भी रिकार्ड पर्यटक पहुंचेगे। जिससे न केवल फूलों की घाटी में चहल-पहल बढेगी अपितु पर्यटन से जुड़े युवाओं और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। वन विभाग द्वारा भी समस्त तैयारी की गयी है। इस बार फूलो की घाटी में ग्लेशियर भी अटे पडे हुये हैं। घाटी पहुंचने वाले पर्यटको के लिये ग्लेशियर रोमांचित करेंगे।

विगत सालों में इतने पर्यटक पहुंचे फूलों की घाटी!

फूलो की घाटी प्रकृति प्रेमियों के लिए सदा से ही आकर्षण का केंद्र रही है। यहां का नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य हर किसी को अभिभूत कर देता है। फूलो की घाटी में वर्ष 2014 में 484 पर्यटक, 2015 में 181, 2016 में 6503, 2017 में 13752, 2018 में 14742 पर्यटक, 2019 में 17424 पर्यटक, 2020 में कोरोना संक्रमण के कारण 932 पर्यटक ही घाटी में पहुंचे थे, 2021 में 9404 पर्यटक फूलों की घाटी आये। 2022 में 20827 पर्यटक और वर्ष 2023 में 12 हजार 707 देशी और 401 विदेशी पर्यटकों सहित कुल 13 हजार 161 देशी विदेशी प्रकृति प्रेमियों ने रंग बदलने वाली घाटी का दीदार किया।

— फूलों का संसार!

फूल शायद सुंदरता के सबसे पुराने प्रतीक हैं। सभ्यता के किसी बहुत प्राचीन आंगन में जंगल और झाड़ियों के बीच उगे हुए फूल ही होंगे जो इंसान को उस ख़ासे मुश्किल वक़्त में राहत देते होंगे। इन फूलों से पहली बार उसने रंग पहचाने होंगे। ख़ुशबू को जाना होगा। पहली बार सौंदर्य का अहसास किया होगा। फूलों की अपनी दुनिया है। वो याद दिलाते हैं कि पर्यावरण के असंतुलन से लगातार धुआंती, काली पड़ती, गरम होती इस दुनिया में फूलों को बचाए रखना जरूरी है।

— कब खुलती है फूलों की घाटी!

सीमांत जनपद चमोली में मौजूद विश्व धरोहर रंग बदलने वाली फूलों की घाटी को हर साल आवाजाही के लिए 1 जून को आम पर्यटकों के लिए खोल दिया जाता है जबकि अक्तूबर अंतिम सप्ताह में 31 अक्तूबर को ये घाटी आवाजाही के लिए बंद हो जाती है।

— कहां है फूलों की घाटी!

उत्तराखंड के चमोली जिले में पवित्र हेमकुंड साहब मार्ग स्थित फूलों की घाटी को उसकी प्राकृतिक खूबसूरती और जैविक विविधता के कारण 2005 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया। 87.5 वर्ग किमी में फैली फूलों की ये घाटी न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। फूलों की घाटी में दुनियाभर में पाए जाने वाले फूलों की 500 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं। हर साल देश विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। यह घाटी आज भी शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र है। नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी सम्मिलित रूप से विश्व धरोहर स्थल घोषित हैं।

— पर्वतारोही फ्रेंक स्माइथ नें की थी खोज!

फूलों की घाटी की खोजने का श्रेय फ्रैंक स्मिथ को जाता है। जब वह 1931 में कामेट पर्वत के अभियान से लौट रहे थे तब रास्ता भटकने के बाद 16700 फीट ऊंचे दर्रे को पार कर भ्यूंडार घाटी में पहुंचे और उन्होंने यहां मौजूद फूलों की इस घाटी को देखा तो यहां मौजूद असंख्य प्रजातियों के फूलों की सुंदरता को देखकर वो आश्चर्यचकित होकर रह गये। फूलों की इस घाटी का आकर्षण फ्रैंक स्मिथ को दुबारा 1937 में यहाँ खींच लाया और उन्होंने यहाँ के फूलों पर गहन अध्ययन व शोध किया और 300 से अधिक फूलों की प्रजातियों के बारे में जानकारी एकत्रित की, जिसके बाद फ्रैंक स्मिथ नें 1938 में फूलों की घाटी में मौजूद फूलों पर ”वैली ऑफ फ्लावर” नाम की एक किताब प्रकाशित किया। जिसके बाद दुनिया नें पहली बार फूलों की इस घाटी के बारे में जाना था। जिसके बाद आज तक इस घाटी के फूलों का आकर्षण हर किसी को अपनी ओर खींचता है। फ्रैंक स्मिथ इस फूलों की घाटी से किस्म के बीज अपने देश ले गये थे ।

मार्गेट लेंगी की कब्र!

1938 में विश्व के मानचित्र पर फूलों की घाटी के छा जाने के बाद 1939 में क्यू बोटेनिकल गार्डन लन्दन की और से जाॅन मार्गरेट लैगी, जिनका जन्म 21 फ़रवरी 1885 को हुआ था, 54वर्ष की उम्र में इस घाटी में मौजूद 500 से अधिक प्रजाति के फूलों का अध्यन करने के लिए आई थी। इसी दौरान अध्ययन करते समय दुर्भाग्यवश फूलों को चुनते हुए 4 जुलाई 1939 को एक ढाल धार पहाड़ी से गिरते हुए उनकी मौत हो गई और फूलो की इस घाटी में वह सदा सदा के लिए चिरनिंद्रा में सो गई। जोन मार्गेट लैगी की याद में यहाँ पर एक स्मारक बनाया गया है जो बरबस ही घाटी में घुमने पर लैगी की याद दिलाती है। जो भी पर्यटक यहाँ घूमने आता है वह लैगी के स्मारक पर फूलों के श्रद्धा सुमन अर्पित कर श्रद्धाजंलि देना नहीं भूलता है।

-पांच सौ प्रजाति से अधिक फूल!

फूलों की घाटी में तीन सौ प्रजाति के फूल अलग-अलग समय पर खिलते हैं। यहां जैव विविधता का खजाना है। यहां पर उगने वाले फूलों में पोटोटिला, प्राइमिला, एनिमोन, एरिसीमा, एमोनाइटम, ब्लू पॉपी, मार्स मेरी गोल्ड, ब्रह्म कमल, फैन कमल जैसे कई फूल यहाँ खिले रहते हैं। घाटी मे दुर्लभ प्रजाति के जीव जंतु, वनस्पति, जड़ी बूटियों का है संसार बसता है।

— हर 15 दिन में रंग बदलती है ये घाटी

फूलों की घाटी में जुलाई से अक्टूबर के मध्य 500 से अधिक प्रजाति के फूल खिलते हैं। खास बात यह है कि हर 15 दिन में अलग-अलग प्रजाति के रंगबिरंगे फूल खिलने से घाटी का रंग भी बदल जाता है। यह ऐसा सम्मोहन है, जिसमें हर कोई कैद होना चाहता

– कैसे पहुंचे और कब आएं फूलों की घाटी!

फूलों की घाटी पहुंचने के लिए सड़क मार्ग से गोविंदघाट तक पहुंचा जा सकता है। यहां से 14 किमी. की दूरी पर घांघरिया है। जिसकी ऊंचाई 3050 मीटर है। यहां लक्ष्मण गंगा पुलिया से बायीं तरफ तीन किमी की दूरी पर फूलों की घाटी है। फूलों की घाटी एक जून से 31 अक्तूबर तक खुली रहती है। मगर यहां पर जुलाई प्रथम सप्ताह से अक्तूबर तृतीय सप्ताह तक कई फूल खिले रहते हैं। यहाँ तितलियों का भी संसार है। इस घाटी में कस्तूरी मृग, मोनाल, हिमालय का काला भालू, गुलदार, हिमतेंदुआ भी दिखता है