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छह वर्ष के ध्रुव ने तप से पाया भगवान का सान्निध्य, प्रह्लाद की भक्ति ने जीता प्रभु का हृदय; कृष्ण जन्म पर भक्ति में झूम उठा कथा पंडाल

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गौरव मिश्रा जी द्वारा बद्रीनाथ धाम में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ के चतुर्थ दिवस श्री मानसपीठ खजुरीताल, मैहर मध्यप्रदेश से पधारे जगद्गुरु स्वामी श्री रामललाचार्य जी महाराज ने ध्रुव चरित्र, प्रह्लाद चरित्र एवं भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया।

महाराज श्री ने कहा कि शास्त्र हमें सिखाते हैं कि भगवान और गुरु की शरण में जाते समय अभिमान, काम, क्रोध और लोभ का त्याग कर जाना चाहिए। भगवान तो इस प्रतीक्षा में बैठे हैं कि मेरा भक्त मेरी ओर एक कदम बढ़ाए, मैं उसकी ओर सौ कदम बढ़ाऊंगा। सच्ची भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं है। श्रद्धा और समर्पण के साथ भगवान की शरण में जाने वाले भक्त पर प्रभु की कृपा अवश्य होती है।

ध्रुव चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में जीवन की सबसे बड़ी गुरु मां होती है। मां ही अपने पुत्र के जीवन की दिशा निर्धारित करती है। ध्रुव की माता ने उन्हें प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि पिता की गोद में बैठना है तो जगत पिता भगवान की गोद में बैठो। माता के इन शब्दों को ध्रुव ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और मात्र छह वर्ष की आयु में कठोर तपस्या कर भगवान को प्राप्त कर लिया।

ध्रुव चरित्र के बाद प्रह्लाद चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा कि ध्रुव और प्रह्लाद दोनों बाल भक्तों ने अपनी अटूट भक्ति से संसार को यह संदेश दिया कि भगवान की प्राप्ति के लिए उम्र नहीं, श्रद्धा और समर्पण आवश्यक है। ध्रुव ने तप और संकल्प से प्रभु को प्राप्त किया, वहीं प्रह्लाद ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान श्रीहरि के प्रति अपना विश्वास नहीं छोड़ा। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को भक्ति से विमुख करने के लिए अनेक यातनाएं दीं, लेकिन उनकी आस्था अडिग रही। अंततः भक्त की रक्षा के लिए भगवान नरसिंह के रूप में प्रकट हुए। महाराज श्री ने कहा कि ध्रुव का चरित्र संकल्प और तप की प्रेरणा देता है, तो प्रह्लाद का चरित्र विपरीत परिस्थितियों में भी अटूट विश्वास बनाए रखने की सीख देता है।

इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का प्रसंग आया तो कथा पंडाल जय श्रीकृष्ण के जयघोष से गूंज उठा। महाराज श्री ने कहा कि जब-जब संसार में अधर्म बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब भगवान भक्तों की रक्षा एवं धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं। कंस के अत्याचारों से पीड़ित संसार को भगवान श्रीकृष्ण के अवतार से नई आशा मिली। भगवान के प्राकट्य का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और पूरा कथा परिसर भक्ति, उल्लास एवं आनंद से सराबोर हो गया।