Home उत्तराखंड उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों पर मंडरा रहा खतरा, 13 झीलें संवेदनशील

उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों पर मंडरा रहा खतरा, 13 झीलें संवेदनशील

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चमोली। तिब्बत-नेपाल सीमा क्षेत्र में ग्लेशियल लेक फटने की घटना के बाद उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से कई झीलों का आकार बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा पैदा हो सकता है।

 

उत्तराखंड में करीब 426 ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं, जिनमें से 13 झीलों को संवेदनशील और खतरनाक माना जा रहा है। इनमें वसुंधरा ताल, माबांग, स्यूंतियांक्ति और प्युंगरु जैसी उच्च हिमालयी झीलें शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन झीलों की नियमित निगरानी और संभावित खतरे की समय रहते जानकारी मिलने के लिए प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम बेहद जरूरी है।
संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से करीब 30 करोड़ रुपये की धनराशि मंजूर की गई है। इसमें से 8.10 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। योजना के तहत झीलों की लगातार निगरानी के लिए आधुनिक उपकरण लगाए जाने हैं, ताकि झील के जलस्तर और अन्य बदलावों की जानकारी समय रहते मिल सके।
हालांकि उच्च हिमालयी क्षेत्रों की दुर्गमता के कारण निगरानी व्यवस्था को प्रभावी बनाना बड़ी चुनौती है। कई इलाकों में बेहतर संचार व्यवस्था और आधुनिक उपकरणों की कमी के कारण रियल टाइम मॉनिटरिंग मुश्किल बनी हुई है।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलौत ने भी हिमालयी ग्लेशियर झीलों को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञों के अनुसार संभावित खतरे को कम करने के लिए संवेदनशील झीलों की वैज्ञानिक निगरानी, मजबूत संचार व्यवस्था और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम को प्राथमिकता देना जरूरी है। समय रहते चेतावनी मिलने से झीलों के नीचे स्थित नदी घाटियों में रहने वाली आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद मिल सकती है।