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केदारताल में आठ ट्रेकर्स के लापता होने से पर्वतीय पर्यटन की सुरक्षा पर उठे सवाल

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उत्तराखंड। केदारताल में आठ ट्रेकर्स के लापता होने की घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते पर्यटन और पर्वतीय सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हिमालय की खूबसूरत वादियां और रोमांचक ट्रेकिंग रूट देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन इन दुर्गम क्षेत्रों में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं होना चिंता का विषय है। सवाल यह है कि क्या बढ़ता पर्वतीय पर्यटन हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ रहा है?
हिमालयी क्षेत्रों में दुर्घटनाओं के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे प्रमुख कारण मौसम का अचानक बदलना है। यहां कुछ ही घंटों में साफ आसमान बादलों, बर्फबारी और तेज हवाओं में बदल सकता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम का गलत अनुमान ट्रेकर्स के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इसके अलावा भारी बर्फबारी के बाद हिमस्खलन का खतरा भी बना रहता है। हालांकि, केदारताल की मौजूदा घटना में हिमस्खलन हुआ है या नहीं, इसकी पुष्टि जांच और बचाव दल की जानकारी के बाद ही हो सकेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, अनुभव और पर्याप्त तैयारी के बिना कठिन पर्वतीय ट्रेक पर निकलना भी जोखिम बढ़ाता है। ऊंचाई, ऑक्सीजन की कमी, ग्लेशियर और बर्फीले रास्तों पर चलने के लिए विशेष प्रशिक्षण और अनुभव की आवश्यकता होती है। वहीं, ट्रेकर्स का पंजीकरण, प्रशिक्षित गाइड की उपलब्धता, मौसम की निगरानी और उनकी लोकेशन का रिकॉर्ड व्यवस्थित नहीं होने पर आपातकालीन परिस्थितियों में बचाव अभियान चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
बदलती जलवायु भी हिमालयी क्षेत्रों के जोखिम को प्रभावित कर रही है। अनियमित वर्षा और बर्फबारी तथा ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव के कारण पर्वतीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में पुराने अनुभवों के आधार पर ही सुरक्षा व्यवस्था तय करना पर्याप्त नहीं है।
उत्तराखंड में इससे पहले भी कई बड़ी पर्वतीय दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2021 में लम्खागा पास और सुंदरढूंगा क्षेत्र में हादसे हुए। वर्ष 2022 में द्रौपदी का डांडा पर्वतारोहण हादसे में 27 पर्वतारोहियों की जान चली गई, जबकि वर्ष 2024 में सहस्त्रताल ट्रेकिंग अभियान के दौरान नौ ट्रेकर्स की मृत्यु हुई थी। इन घटनाओं ने पर्वतीय पर्यटन में सुरक्षा इंतजामों की आवश्यकता को बार-बार सामने रखा है।
हर दुर्घटना के बाद जांच और समीक्षा होती है, कुछ दिनों तक चर्चा भी होती है, लेकिन समय बीतने के साथ सुरक्षा से जुड़े सवाल फिर पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था केवल दुर्घटना के बाद राहत एवं बचाव अभियान तक सीमित न रहे, बल्कि दुर्घटनाओं को रोकने के लिए पहले से प्रभावी कदम उठाए जाएं।
पर्वतीय पर्यटन में ट्रेकर्स का अनिवार्य पंजीकरण, प्रशिक्षित गाइड, मौसम आधारित अनुमति, नियमित निगरानी, आपातकालीन संचार व्यवस्था और जोखिम वाले मार्गों की पहचान जैसे उपायों को प्राथमिकता देनी होगी। वहीं, पर्यटकों को भी अपनी शारीरिक क्षमता, अनुभव और मौसम की स्थिति का आकलन करने के बाद ही कठिन ट्रेक पर जाना चाहिए।
केदारताल में लापता सभी आठ ट्रेकर्स की सुरक्षित वापसी की उम्मीद की जा रही है। बचाव अभियान में जुटे एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम), सेना, वन विभाग और स्थानीय लोगों के प्रयास सराहनीय हैं।
हिमालय केवल रोमांच और खूबसूरत तस्वीरों का माध्यम नहीं है, बल्कि प्रकृति की अपार शक्ति और संवेदनशीलता का प्रतीक भी है। हिमालय में पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। पर्वतीय पर्यटन में सुरक्षा को सुविधा नहीं, बल्कि पहली प्राथमिकता बनाना समय की मांग है।